Baba Amte Essay In Hindi

मुरलीधर देवीदास आमटे का जीवन परिचय (Biography Of Baba Amte In Hindi Language)

नाम : मुरलीधर देवीदास आमटे
जन्म : 26 दिसम्बर 1914
जन्मस्थान : हिंगनधार, वर्धा (महाराष्ट्र)
मृत्यु : 9 फरवरी 2008
उपलब्धियां : पद्मश्री (1971), ‘पद्‌मभूषण’ (1973), पद्मविभूषण (1980), ‘डैमिन डट्टन अवार्ड’ (1983), रमन मैग्सेसे (1985), यू.एन. ह्यूमन राइट अवार्ड (1988), ‘टेंप्लेशन प्राइज’ (1990), ‘राइट लिवलीहुड अवार्ड’ (1992), इन्टरनैशनल गाँधी पीस प्राइज (1999), डॉ. अम्बेडकर इन्टरनैशनल अवार्ड |

भारतीय परम्परा के अनुसार गरीब लाचारों को दयावश कुछ दान, कुछ भीख देना पुण्य का काम माना जाता है, लेकिन बाबा देवीदास मुरलीधर आमटे ने इस परम्परा को नकार कर अपना अलग ही जीवन-दर्शन सामने रखा । उन्होंने कहा कि इन्हें भीख मत दो, इनके लिए कुछ काम करो, इन्हें अवसर तथा सुविधा दो ताकि यह सम्मान का जीवन जीते हुए समाज को कुछ दे सकें | बाबा आमटे ने कुष्ठ रोगियों की स्थिति को समझ कर लक्ष्य बनाया कि वह समाज से बहिष्कृत इस वर्ग के हित में सार्थक काम करेंगे । उन्होंने फिर इसी लक्ष्य के लिए अपनी निजी सम्पत्ति सुख-सुविधा, सब ठुकरा दी और इन्हीं के पुनर्वास, इनकी सेवा तथा इस रोग के निवारण में लग गए | बाबा आमटे के इस विशेष महत्व के काम के लिए उन्हें 1985 में मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया ।

मुरलीधर देवीदास आमटे का जीवन परिचय (Biography Of Baba Amte In Hindi)

मुरलीधर देवीदास आमटे का जन्म 26 दिसम्बर 1914 को महाराष्ट्र राज्य के वर्धा जिले के हिंगनधार गाँव में हुआ था । उनका पैतृक परिवार जागीरदारों का समृद्ध परिवार गिना जाता था । मुरलीधर देवीदास आमटे ने, जो प्यार से बाबा आमटे कहलाते थे, बैरिस्टरी पढ़ी थी और वह बहुत बड़ी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी थे । उस दौरान समाज में कुष्ठ रोग को दैवी श्राप माना जाता था और कुष्ठ रोगी समाज से बहिष्कृत थे । वह घर-परिवार, सेवा-इलाज से तो वंचित थे ही, समाज द्वारा घृणा की दृष्टि से भी देखे जाते थे । इन नाते उनकी दशा बेहद दारुण थी और उनके लिए किसी की भी नजर में कोई सहानुभूति नहीं थी ।

इसे भी पढ़ें :- संत सूरदास की जीवनी

ऐसे में बाबा आमटे ने अपनी चलती हुई वकालत तथा जागीरदारी की दौलत और ऐशो-आराम सब का त्याग कर दिया और यह व्रत लिया कि वह कुष्ठ रोगियों की सेवा तथा कुष्ठ रोग निवारण में अपना जीवन लगा देंगे । आमटे अपने बचपन से ही परम्परा विरोधी स्वभाव के थे । वह जिद करके अछूतों के साथ खाना-पीना कर लेते थे ।

जब उनका विवाह हुआ वह वकालत कर ही रहे थे । लेकिन विवाह के कुछ ही सप्ताह बाद उन्होंने अपनी पत्नी साधना से सलाह-मशविरा किया और वकालत के साथ-साथ पैतृक घर-जायदाद भी छोड्‌कर कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने निकल पड़े ।

इस क्रम में एक घटना उनके जीवन में महत्त्वपूर्ण है । उन्होंने एक बार एक कुष्ठ रोगी को तिल-तिल दयनीय स्थिति में मरते हुए देखा तो द्रवित हो गए । उन्होंने 1951 में कलकत्ता के ‘स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन्स’ में प्रवेश लिया और कुष्ठ रोगों के बारे में जानकारी जुटाई । उसके बाद ही 1951 में तुरन्त, उन्होंने वहाँ से छह कुष्ठ रोगी, एक लंगड़ी गाय तथा अपनी पत्नी-परिवार को साथ लिया और बीस हैक्टयेर में फैले वीरान, पथरीले बंजर इलाके में आ गए, यह स्थान महाराष्ट्र में चन्द्रपुर के पास है । जब वह वहाँ पहुंचे, तब उस इलाके में बिच्छू-साँप से लेकर चीते तक का साम्राज्य था । बाबा आमटे ने वहाँ अपना आनन्दवन आश्रम बसाया और उस इलाके को सचमुच का आनन्दवन बना दिया । आनन्दवन आश्रम का अनुभव बाबा आमटे के लिए नया नहीं था । वह एक स्वतन्त्रता सेनानी भी थे तथा महात्मा गाँधी के परम भक्त भी । उन्होंने गाँधी जी के आश्रम में कुछ समय बिताया था । वह विनोबा भावे से भी प्रभावित थे । रवीन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य और व्यक्तित्व ने भी उन्हें गढ़ने में मदद की थी ।

आश्रम में रहते हुए बाबा आमटे कुष्ठ रोगियों की सेवा में लग गए । उन्होंने आश्रम के परिवेश को ऐसा बनाया, जहाँ कुष्ठ रोगी सम्मान से जीवन जी सकें तथा यथा क्षमता आश्रम की गतिविधियों में योगदान दे सकें । उसे बाबा आमटे की त्याग भावना का चरम बिन्दु कहा जा सकता है कि कुष्ठ रोग निवारण के दौर में किए जा रहे चिकित्सा और औषधि के प्रयोग परखने के लिए बाबा ने अपने शरीर को कुष्ठ के पनपने का माध्यम बनाना स्वीकार कर लिया, ताकि उस पर नई औषधि और चिकित्सा पद्धति आजमाई जा सके ।

आनन्दवन आश्रम में कुष्ठ रोगियों की सेवा के अतिरिक्त भी बाबा आमटे ने ऐसा कार्य किया जिसे उनकी चेतना का तथा नेतृत्व क्षमता का उदाहरण कहा जा सकता है । 1985 में बाबा ने ‘भारत जोड़ो’ आन्दोलन देश की अखण्डता के लिए छेड़ा जिसे वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक ले गए । इस आन्दोलन में शान्ति तथा पर्यावरण की रक्षा का सन्देश भी निहित था ।

वर्ष 1988 में बाबा ने यही ‘भारत जोड़ो’ आन्दोलन फिर छेड़ा । इस बार उनकी सक्रियता गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक थी । 1990 में बाबा आमटे ने आश्रम छोड़ कर नर्मदा नदी के किनारे डेरा डाला । वहीं स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी करते हुए उन पर अन्याय किया जा रहा था । सरदार सरोवर बाँध का निर्माण नर्मदा और उसके किनारे के स्थानीय निवासियों के लिए एक खतरा था । बाबा आमटे ने आश्रम की जिम्मेदारी दूसरे लोगों पर छोड़ी और खुद ‘नर्मदा बचाओ’ आन्दोलन में भागीदारी करने के लिए सीधे वहीं पहुँच गए । आनन्दवन के बीहड़ बियाबान क्षेत्र को आश्रम में बदलना उनकी अनुभव सम्पदा में बहुत जगह रखता है । इस क्रम में एक घटना वह याद करते हैं । उस पथरीली जमीन वाले क्षेत्र में कुआँ खोदा जाना था । दस मीटर गहरी खुदाई में तीन हफ्तों का समय लग गया । कहते हैं, कि हमारी आँखों में पानी भरा था, जो बह निकला था, लेकिन खुदाई के बावजूद भूमि सूखी की सूखी थी, बाबा ने फिर भी धैर्य रखा और सबका हौसला बनाए रहे । आखिर उन्हें सफलता यहाँ तक मिली कि दो वर्षों में वही भूमि उनके लिए खाद्यान्न की दृष्टि से आत्मनिर्भर बन गई । इससे केवल आनन्दवन का निर्माण नहीं हुआ, वहाँ के निवासियों में आत्मविश्वास और आत्म-स्वाभिमान की भावना भी उपजी ।

आनन्दवन के बाद 1957 में बाबा आमटे ने 40 हेक्टेयर के क्षेत्र में, नागपुर के उत्तर में अशोकवन बनाया । एक दशक बाद यही स्थापना सोमनाथ में भी रची गई । आनन्दवन की ही तरह इन सब स्थानों में विकलांगों के पुनर्वास की पूरी व्यवस्था तैयार की गई है ।

1974 में बाबा आमटे ने लोक बिरादरी प्रकल्प की स्थापना मीडिया तथा गौंड आदिवासियों की रक्षा के लिए की । अपने भ्रमण तथा देशाटन के दौरान बाबा यहाँ एक लड़के से मिले और उसके भोलेपन से बेहद प्रभावित हुए । बाबा को इस बात से झटका लगा कि वहाँ के लोगों ने कभी पहिया नहीं देखा.. .उन्होंने भारत का कभी नाम नहीं सुना और अब वह सभ्यता के अतिक्रमण के कारण होने वाले अन्याय से पीड़ित हैं । बाबा ने आदिवासियों की दयनीय अवस्था से प्रभावित होकर यह जिम्मेदारी भी उठा ली और अपने नवविवाहित छोटे बेटे तथा पुत्रवधू को बुलाकर लोक बिरादरी प्रकल्प की जिम्मेदारी थमाई और स्वयं भी उससे जुड़े रहे । बाबा के यह पुत्र तथा पुत्रवधू दोनों ही डॉक्टर हैं ।

इसे भी पढ़ें :- चन्द्रशेखर वेंकट रमन की जीवनी

बाबा को अनेक राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार, सम्मानों से अलंकृत किया गया । भारत सरकार की ओर से उन्हें 1971 में पद्‌मश्री दिया गया तथा 1980 में वह पद्‌मविभूषण से अलंकृत हुए । 1983 में उन्हें ‘डैमिन डट्टन अवार्ड’ दिया गया । 1988 में बाबा आमटे जीडी बिड़ला इन्टरनैशनल अवार्ड तथा यू.एन. ह्यूमन राइट अवार्ड से सम्मानित किए गए । यूनाइटेड किंगडम लन्दन के ‘टेंप्लेशन प्राइज’ से वह 1990 में सम्मानित किए गए । इसी वर्ष उन्हें अमेरिका द्वारा इन्टरनैशनल जिराफ अवार्ड दिया गया । स्वीडन पार्लियामेंट का ‘राइट लिवलीहुड अवार्ड’ उन्होंने 1992 में पाया ।

1999 में उन्हें इन्टरनैशनल गाँधी पीस प्राइज तथा भारत का डॉ. अम्बेडकर इन्टरनैशनल अवार्ड दिया गया ।

9 फरवरी 2008 को 94 वर्ष की आयु में बाबा मुरलीधर देवीदास आमटे ने इस संसार से विदा ली ।

Tags : Baba Amte History, Short Essay On Baba Amte In Hindi, Samaj Sudharak Baba Amte Essay In Hindi, Biography Of Baba Amte In Hindi Language, Samaj Sevak Baba Amte In Hindi, Samaj Sudharak Baba Amte In Hindi, Short Note On Baba Amte In Hindi.

English

Murlidhar Devidas Amte, popularly known as ‘Baba Amte’ (‘baba’ is a honorific and his last name is pronounced as Am’tay) was born on December 1914 in Vidharbha, Maharashtra, India in a wealthy family. Educated with a law degree, he setup a successful practice in Warora, and was leading a very prosperous life. One one rainy day, he saw a leper on the street getting drenched in rain and left helpless. Baba Amte thought to himself – ‘What would have happened if I was in his position?‘ This little incident was enough to cause a paradigm shift in his perception of society. The well educated rich professional simply quit his practice and decided to dedicate his life to the cause of social justice. Leprosy was/is probably the most damned disease in India. Plenty of myths and orthodox beliefs existed around leprosy patients. As a result, they were (and still are to some extent) subjected to severe social boycott and condemnation. Baba Amte devoted his life for the cause of the leprosy affected, even allowing his body to be used for medical experiments. With 14 Rupees, two cows and a makeshift building, Baba Amte and his wife established a community project at Anandwan (आनंद वन abode of happiness) near the woods of Nagpur, Maharashtra, central India. Today Anandvan is recognised all over the world and has led the crusade for dispelling prejudice against leprosy in India. It has a sprawling campus of 180 hectors and runs a budget of millions of Rupees. Thousands of patients live in this colony.

Last Update: 2014-10-26
Subject: General
Usage Frequency: 1
Quality:
Reference: Anonymous

0 thoughts on “Baba Amte Essay In Hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *